03 अगस्त 2011

अमेरिकी कर्ज संकट से आर्थिक मंदी का खतरा

अमेरिका का कर्ज संकट दुनिया के लिए एक बड़े खतरे का संकेत है। हालांकि उसका तात्कालिक कर्ज संकट रिपब्लिकनों और डेमोक्रेट्स की आम सहमति से टल गया है, लेकिन खतरा समाप्त नहीं हुआ है। समझौते के पहले चरण में कर्ज लेने की सीमा में 900 बिलियन डॉलर की छूट के एवज में सरकारी खर्च में उतने की ही कटौती की जाएगी। दूसरे चरण के तहत कांग्रेस की एक सुपर कमेटी नवंबर तक 1.5 अरब डॉलर तक की बचत के उपाय सुझाएगी। अमेरिका आज कर्ज के जिस जाल में फंसा है उससे निकलने का कोई उपाय उसे दिख नहीं रहा है।

अमेरिका के आर्थिक संकट का असर भारत पाकिस्तान जैसे एशियाई देशों के साथ-साथ पूरी दुनिया पर पड़ना तय है। वर्तमान वैश्विक युग में दुनिया के देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इसका असर उन देशों पर अधिक पड़ेगा जिनके साथ अमेरिका का व्यापार अधिक होता है। अमेरिका का आर्थिक संकट दुनिया के कई देशों को मंदी की चपेट में ला सकता है। अमेरिकी सरकार का घरेलू कर्ज इतना ज्यादा है कि हर सप्ताह करीब 90 अरब डॉलर की देनदारी (अगस्त में 500 अरब डॉलर) निकल रही है। अमेरिका को अपने जीडीपी अनुपात में करीब 18 फीसदी राशि बकाया कर्ज के पुनर्वित्त यानी रिफाइनेंस के लिए चाहिए।

इसका मतलब है कि अमेरिका बड़े ऋण जाल में फंस चुका है। अमेरिका के लिए वापसी अब लगभग नामुमकिन है और उबरने का हर इलाज उसे कमजोर ही करेगा। अमेरिका में मंदी की शुरुआत वर्ष 2008 से हुई थी। इस मंदी की चपेट में जब अमेरिका के बड़े-बड़े कारपोरेट एक-एक करके धराशायी होने लगे तो अमेरिकी सरकार ने इनके लिए अपने खजाने के दरवाजे खोल दिए। उसने अरबों डॉलर के बेलआउट पैकेज देकर बैंक ऑॅफ अमेरिका, सिटीग्रुप और एआइजी जैसे वित्तीय संस्थानों के साथ ही आटो दिग्गज जनरल मोटर्स जैसी कई कंपनियों को बचाया। इस राहत पैकेज से अमेरिकी कारपोरेट तो मंदी के भंवर से निकल आया, मगर अपनी अर्थव्यवस्था को उबारने की कोशिश में अमेरिकी सरकार ने खर्चे इतने ज्यादा बढ़ा दिए कि कर्जे की तय सीमा भी पार होने वाली है।

अमेरिकी संविधान में कर्ज की तय सीमा 14,300 अरब डॉलर है। भारतीय मुद्रा में यह रकम 6,34,900 अरब रुपये बैठती है। अब अमेरिका चाहे कर्ज की सीमा बढ़ाए या न बढ़ाए दोनों ही हालत में अमेरिका की ट्रिपल ए रेटिंग घट जाएगी। अमेरिका की रेटिंग में कमी एक ऐतिहासिक फैसला होगा, क्योंकि अमेरिकी बांड कर्ज के बाजार में सोने से ज्यादा खरे और सबसे मजबूत जमानत माने जाते हैं। रेटिंग घटते ही अमेरिका में ब्याज दर बढ़ेगी जो कर्ज के पहाड़ को काटने की राह और मुश्किल कर देगी। इसका असर उसके व्यापार पर पड़ेगा। अमेरिका का वार्षिक बजट घाटा डेढ़ खरब डॉलर है। कर्ज संकट से निपटने के लिए कर्ज लेने की क्षमता बढ़ाने का काम अमेरिकी सीनेट में आमतौर पर होता रहा है, लेकिन इस बार रिपब्लिकन पार्टी कर्ज बढ़ाने के मुद्दे पर कड़ा रुख अपना रही है। रिपब्लिकन चाहते हैं कि सरकार टैक्स में कोई बढ़ोतरी न करे, जबकि डेमोक्रेट का मानना है कि गरीबों, बूढ़ों और अन्य लोगों को पेंशन योजना के लिए पैसा टैक्स बढ़ोतरी से हासिल किया जाए।

अमेरिकी सरकार एक निश्चित सीमा तक कर्ज लेने के कानूनी प्रावधान से बंधी है। इससे प्राप्त धन से ही सरकार अपने नियमित खर्चो का भुगतान करती है। इनमें सेना का वेतन, वर्तमान कर्ज पर ब्याज की रकम और स्वास्थ्य सुविधाओं पर होने वाला खर्च भी शामिल है। उसकी कर्ज लेने की 14.3 अरब डॉलर की सीमा मई में ही खत्म हो चुकी थी। वित्त मंत्री टिमोथी गीथनर ने सरकारी पेंशन योजनाओं के लिए किए जाने वाले भुगतान को आगे बढ़ाने के लिए समय सीमा को दो अगस्त तक बढ़ाने जैसे कदमों का सहारा लिया था।

रिपब्लिकन और कुछ विश्लेषकों का मानना है कि दो अगस्त के बाद भी सरकार कुछ दिन और खर्चे चला सकती है, लेकिन इसके बाद कर्ज लेना सरकार के अधिकार क्षेत्र के बाहर है। सभी सरकारी कर्जो को अमेरिकी संविधान के तहत संसद से मंजूरी लेनी पड़ती है। कर्ज लेने की सीमा पहली बार 1917 में शुरू की गई थी, ताकि सरकार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अपने खर्चे चला सके। उसके बाद यह सीमा कई बार बढ़ाई जा चुकी है।

आमतौर पर यह महज एक औपचारिकता ही होती है। इससे पहले कांग्रेस सरकार के खर्चो और टैक्स को तय करती रही है। ओबामा प्रशासन एक ऐसी असहज स्थिति का सामना कर रहा है जिसमें उसके खर्चे उपलब्ध आमदनी से कहीं ज्यादा हैं। वित्तीय संकट और अमेरिका की दुर्बल अर्थव्यवस्था की वजह से सरकार के खर्चो में तो वृद्धि हुई जबकि टैक्स से मिलने वाला राजस्व बुरी तरह प्रभावित हुआ। परिणामस्वरूप सरकार का घाटा बढ़ गया। प्रतिनिधि सभा पर प्रभुत्व रखने वाले रिपब्लिकन सांसदों का कहना है कि वित्तीय घाटा काबू किया जाए। दोनों ही मानते हैं कि घाटे में कमी करना जरूरी है, लेकिन दोनों पार्टियों की आर्थिक नीतियां अलग हैं। सीनेटर के एक समूह ने खर्चो में कटौती और टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था। जहां रिपब्लिकन सांसद खर्च में और अधिक कटौती की मंाग कर रहे हैं, वहीं डेमोक्रेट चाहते हैं कि खर्चो में कटौती न हो, बल्कि कारपोरेट सेक्टर पर अधिक टैक्स लगाकर कर्ज संकट से उबरने का रास्ता निकाला जाए।

अमेरिकी सीनेट ने देश की कर्ज सीमा को बढ़ाने वाला बिल खारिज कर दिया था। डेमोक्रेटिक पार्टी की बहुमत वाली सीनेट में इस बिल के गिरने की आशंका पहले से ही जताई जा रही थी। पर अब उसने सरकारी खर्चो में कटौती की शर्त के साथ कर्ज की सीमा बढ़ाए जाने पर सहमति प्रदान कर दी है। गौरतलब है कि अगर दो अगस्त तक ये मसला नहीं सुलझता तो अमेरिका में नकदी की उपलब्धता का संकट पैदा हो जाता। साथ ही अमेरिका की कर्ज लौटाने की क्षमता भी प्रभावित होगी।

इस बिल को लेकर रिपब्लिकन और डेमोके्रटिक पार्टी के बीच भारी मतभेद रहे। रिपब्लिकन पार्टी चाहती है कि अल्पकालिक कर्जो की सीमा 900 बिलियन डॉलर तक की जाए, लेकिन डेमोक्रेट्स इस सीमा को बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चेतावनी दी थी कि अगर राजनीतिक दलों ने देश के कर्ज संकट को निपटाने के उपायों पर जल्द समझौता नहीं किया तो सभी अमेरिकी लोगों को परेशान होना पड़ेगा।

उन्होंने अमेरिकी लोगों से आग्रह किया था कि वे राजनेताओं पर समय रहते अपने मतभेद दूर करने का दबाव बढ़ाएं, क्योंकि इस संकट के कारण अमेरिका की साख पर असर पड़ सकता है। ओबामा ने इस बारे में दोनों पक्षों से समझौता कर किसी तरह सुलह पर पहुंचने का आह्वान किया था। फिलहाल यह संकट टल गया है पर चिंता बरकरार है। अमेरिकी मंदी का खतरा यूरोप तक पहुंच गया और अब एशियाई देश भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की नई प्रमुख क्रिस्टीना लगार्द ने यूरोपीय नेताओं को चेतावनी दी है कि यूरो जोन की आर्थिक समस्याओं की वजह से वहां सामाजिक अस्थिरता का खतरा पैदा हो सकता है। ग्रीस, पुर्तगाल और आयरलैंड में ऋण संकट के बाद इटली और स्पेन के ऊपर भी इसका खतरा मंडरा रहा है। हाल ही में ग्रीस के लिए जारी किए गए 96 खरब डॉलर के राहत पैकेज के बावजूद आर्थिक संकट का खतरा खत्म नहीं हुआ है। मध्य-पूर्व के देशों और उत्तर अफ्रीका में राजनीतिक उथल-पुथल जैसी सामाजिक समस्याएं भी इन उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय हैं।

जहां एक तरफ युवा बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं तो दूसरी ओर बुजुर्ग अपने स्वास्थ्य और पेंशन सुविधाओं को बचाने को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। इन दोनों ही समस्याओं के चलते पीढि़यों के बीच संघर्ष का सामना दिख सकता है। वास्तव में आज दुनिया एक नए तरह के वैश्विक संकट की ओर बढ़ रही है जिसकी सबसे ज्यादा कीमत गरीब देशों को चुकानी पड़ रही है।

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