विकास परियोजनओं के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहण करने के बदले किसानों को केवल मुआवजा राशि देने से काम नहीं चलेगा। दरअसल जमीन किसानों के लिए केवल रोजी-रोटी का जरिया ही नहीं है बल्कि यह उनकी सुरक्षा और पूरे परिवार के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। जमीन हाथ से निकल जाने के बाद उनके पास कुछ भी नहीं बचेगा। सरकार जो मुआवजा राशि दे रही है वह बेहद कम है और साल दो चार साल के बाद इस राशि का खत्म होना तय है। ऐसे में किसानों के सामने भविष्य में रोजी-रोटी का बड़ा संकट मुंह बाए खड़ा हो जाएगा।
सरकार का जो गैर जिम्मेदराना रवैया है उससे नहीं लगता है कि वह किसानों के भविष्य के बारे में कुछ सोच रही है और वह आगे उनके लिए रोजगार की व्यवस्था करेगी। अगर सरकार वास्तव में किसानों से जमीन लेना चाहती है तो इसके बदले उन्हें भरपूर मुआवजे के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी देनी होगी। यानी जमीन के बदले मौजूदा बाजार कीमत पर मुआवजा राशि तो मिले ही इसके अलावा किसानों के लिए जीवन भर पेंशन देने की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही उस जमीन पर बनने वाली विकास परियोजनाओं में किसानों को हिस्सेदारी दी जाए ताकि भविष्य में भी इससे आय मिलती रहे। यदि जमीन का इस्तेमाल सड़क या अन्य सरकारी कामों के लिए किया जाता है तो सरकार जमीन देने वाले किसान परिवार के सदस्य को सरकारी नौकरी व अन्य सुविधाएं देने का वादा करे। तभी किसान विकास के लिए अपनी जमीन देने के लिए तैयार हो सकते हैं।
लाठी के बल पर सरकार किसानों से छीन रही जमीन
उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना यमुना एक्सप्रेस वे बनाने के लिए कुल 2.5 लाख हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित करने की योजना है। आपको यह जान कर सरकार के खिलाफ भारी गुस्सा आएगा कि एक ओर जहां उसने किसानों से सारी जमीन 800 रुपये प्रति वर्गफुट की दर से ली है तो वही जमीन बिल्डरों, ठेकेदारों और निजी कंपनियों के हाथों 22,000 से 45,000 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर बेच रही है। अब ये निजी कंपनियां और बिल्डर उसी जमीन से करोड़ों रुपये बटोरेंगे। जबकि किसानों के हाथ क्या लगेगा? कुछ भी नहीं। 800 रुपये की दर से मिली राशि का भुगतान कब होगा और कैसे होगा कोई नहीं कह सकता लेकिन किसानों की जमीन जबरदस्ती उनसे ले ली गई है। दूसरी तरफ किसान नहीं चाहते कि वह अपनी जमीन मुख्यमंत्री की इस बेहुदा परियोजना में लगाकर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाएं। क्योंकि यही जमीन उसकी रोजी-रोटी का जरिया है और यह उसके हाथ से निकल जाने के बाद किसानों के समक्ष भूख से मरने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं होगा।
नहीं गई अंगे्रजीयत मानिसकता
सब कुछ बदला लेकिन अंग्रेजों के जमाने का कानून और अंंग्रेजीयत मानसिकता नहीं बदली। ढेर सारे कानून आज भी अंग्रेज के जमाने के हैं। भूमि अधिग्रहण कानून को ही लीजिए, इसे 1894 ई में अंग्रेजों ने बनाया था। जिसमें साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि देश हित के नाम पर जमीन का अधिग्रहण किसानों की राजी खुशी या जबरदस्ती किया जाएगा। यानी किसान अगर चाहे कि वो अपनी जमीन नहीं देना चाहते हैं तो फिर भी सरकार उनकी जमीन जबरदस्ती ले सकती है। अब सोचिए। आज की सरकार की यह अंग्रेजीयत मानसिकता है या नहीं कि वो आज भी लाठी और बंदुक के बल पर किसानों से उसका जमीन छीन रही है। अंग्रेजों से दो कदम और दूर आज की सरकार ने तो देश हित के नाम पर जमीन किसानों से लेकर निजी कंपनियों, बिल्डरों और भूमाफियाओं को रेबडिय़ों के भाव में बांट रही है। फिर यह काहे का राष्टï्रहित है। कानून को मानना हमारा फर्ज नहीं है। किसानों को किसी भी तरह की परियोजनाओं के लिए अपनी जमीन देने से मना कर देना चाहिए। विकास के लिए जमीन देने का ठेका किसानों ने नहीं ले रखा है।
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17 मई 2011
09 मई 2011
किसानों की जमीन और खून की कोई कीमत नहीं !
विकास के नाम पर जिस तरह किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है उससे किसानों का उग्र होना स्वाभाविक है। दरअसल यह विकास के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीन हड़पने की यह षड्यंत्र है। सड़क, हाइवे बनाने या उद्योग लगाने के नाम पर बेहद कम मुआवजा देकर किसानों को उनकी जमीन देने के लिए बाध्य किया जाता है। और फिर बाद में ये जमीन उद्योगपतियों के हवाले कर दिया जाता है। इसके बाद किसानों को बुरी तरह से पूरे क्षेत्र से बेदखल कर दिया जाता है। इससे किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है।
कैसे करेंगे गुजर-बसर
आज भी किसानों की रोजी रोटी का एक मात्र जरिया उनकी जमीन है। अगर यही उनके हाथ से चली जाएगी तो फिर वे क्या जोत-कोढ़ कर खाएंगे। आधी पेट खाकर सोने के लिए मजबूर किसान जमीन छीन जाने के बाद अपने परिवार का गुजारा कैसे करेंगे? ऐसे में किसान नहीं चाहते कि विकास के नाम पर उनकी जमीन की बली चढ़ाई जाए। आखिर हाइवे बनने या मॉल बनने के लिए किसान अपनी जमीन क्यों दे जबकि विकास का लाभ किसानों को बिल्कुल भी नहीं मिला है। सरकार, नेता, सामाजिम कार्यकर्ता किसी को भी इसकी परवाह नहीं है। अब चूंकि किसान हिंसक आदोलन पर उतर आए हैं तो लोगों को लग रहा है कि भोले-भाले किसानों को कोई उकसा रहा है। वास्तव में किसानों को कोई और नहीं बल्कि सरकार की गलत नीति ही उन्हें हिंसक आंदोलन के लिए उकसा रही है।
केवल मुआवजे से काम नहीं चलेगा
क्या सरकार यह वादा करती है कि विकास के नाम पर जमीन देने वाले किसानों को मुआवजे के अलावा जीवन भर पेंशन के रूप अच्छी खासी राशि दी जाएगी। इसके अलावा उनके परिवार के कम से कम एक सदस्य को सरकारी नौकरी और अन्य सुविधाएं दी जाएगी। साथ ही सरकार उन्हें विकास में भागीदार बनाने का भी वादा करे। तभी किसान अपनी जमीन देने के लिए तैयार हो सकते हैं। अगर सरकार ऐसे वादे नहीं करती है तो फिर किसान अपनी जमीन क्यों दे?
कैसे करेंगे गुजर-बसर
आज भी किसानों की रोजी रोटी का एक मात्र जरिया उनकी जमीन है। अगर यही उनके हाथ से चली जाएगी तो फिर वे क्या जोत-कोढ़ कर खाएंगे। आधी पेट खाकर सोने के लिए मजबूर किसान जमीन छीन जाने के बाद अपने परिवार का गुजारा कैसे करेंगे? ऐसे में किसान नहीं चाहते कि विकास के नाम पर उनकी जमीन की बली चढ़ाई जाए। आखिर हाइवे बनने या मॉल बनने के लिए किसान अपनी जमीन क्यों दे जबकि विकास का लाभ किसानों को बिल्कुल भी नहीं मिला है। सरकार, नेता, सामाजिम कार्यकर्ता किसी को भी इसकी परवाह नहीं है। अब चूंकि किसान हिंसक आदोलन पर उतर आए हैं तो लोगों को लग रहा है कि भोले-भाले किसानों को कोई उकसा रहा है। वास्तव में किसानों को कोई और नहीं बल्कि सरकार की गलत नीति ही उन्हें हिंसक आंदोलन के लिए उकसा रही है।
केवल मुआवजे से काम नहीं चलेगा
क्या सरकार यह वादा करती है कि विकास के नाम पर जमीन देने वाले किसानों को मुआवजे के अलावा जीवन भर पेंशन के रूप अच्छी खासी राशि दी जाएगी। इसके अलावा उनके परिवार के कम से कम एक सदस्य को सरकारी नौकरी और अन्य सुविधाएं दी जाएगी। साथ ही सरकार उन्हें विकास में भागीदार बनाने का भी वादा करे। तभी किसान अपनी जमीन देने के लिए तैयार हो सकते हैं। अगर सरकार ऐसे वादे नहीं करती है तो फिर किसान अपनी जमीन क्यों दे?
24 फ़रवरी 2011
खेतों में चलेगा हल,तो मिलेगा अर्थव्यववस्था को बल
वर्तमान यूपीए सरकार के कार्यकाल कृषि क्षेत्र बेहद बुरे दौर से गुजर रहा है। और सरकार के इरादे से साफ लगा रहा है कि वह कृषि क्षेत्र को लेकर न तो गंभीर है और न ही इस दिशा में कोई कदम उठाने जा रही है। कृषि क्षेत्र में सुधार का एजेंडा तैयार करना आम लोगों के लिए तो जरूरी है ही साथ ही सरकार और देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी उतना ही अहम है। इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि जब खोतों में चलेगा हल, तभी मिलेगा अर्थव्यवस्था को भी बल।
अब तब महंगाई के मोर्चे पर पूरी तरह चित हो चुकी सरकार के लिए महंगाई से लोगों को राहत दिलाने का यही एक मात्र हथियार है। लेकिन सरकार के रवैये से लगता नहीं है कि वह इस बार भी ऐसा कुछ करने जा रही है क्योंकि उन्हें लोगों की बेहतर जिंदगी से ज्यादा अर्थव्यवस्था की ऊंची विकास दर प्यारी है। बजट सत्र के दौरान सरकार ने साफ तौर पर कह दिया वह महंगाई से तो चिंतित है लेकिन किसी भी शर्त पर ऊंची विकास दर से समझौता नहीं किया जा सकता। सरकार की मंशा जाहिर है कि उसे विकास दर कम करने की शर्त मंजूर नहीं है भले ही आम आदमी महंगाई की इस चक्की में पिस-पिस कर मर जाए। सरकार को आम लोगों की परेशानी से कोई लेना-देना नहीं है।
ऊंची विकास दर को बनाए रखना गलत नहीं है लेकिन कृषि क्षेत्र को बिल्कुल उपेक्षित रखना खतरनाक है। सरकार के इरादे से तो यही लगता है कि केवल विदेशी पूंजी निवेश बढ़ाने और आर्थिक सुधार की गति तेज करने से ऊंची विकास दर आसानी से हासिल की जा सकती है। जबकि सरकार का जोर कृषि क्षेत्र में सुधारों पर बिल्कुल भी नहीं है। सरकार को यह याद रखनी चाहिए कि कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन से ही हम मजबूत आर्थिक विकास की ओर बढ़ सकेंगे। कृषि उत्पादन बढऩे की स्थिति में ही सरकार को भी महंगाई पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी। देखा जाए तो हाल के दिनों में खाद्य वस्तुओं के बढ़ते दामों ने ही लोगों को सबसे ज्यादा परेशान किया है। अगर देश में कृषि उत्पादन बढ़े तो लोगों को महंगाई से भी राहत मिलेगी और देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
खेती पर आज भी देश की 67 फीसदी आबादी निर्भर करती है। जब कृषि क्षेत्र का विकास होगा तभी खेती कार्यों से जुड़े लोगों विशेषकर किसानों और मजदूरों की माली हालत सुधरेगी। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र क्षेत्र का समग्र विकास संभव होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक विकास के जरिये ही देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है और इससे ऊंची विकास दर को बनाए रखने में भी आसानी होगी। सरकार को एक बात साफ तौर पर जान लेनी चाहिए कि केवल दिल्ली, मुंबई और अन्य महनगरों में ऊंची-ऊंची इमारतें, चमचमती गाडिय़ां और बहुराष्टï्रीय कंपनियों में काम के लिए दिन रात भागते लोग ही विकास का पैमाना नहीं है। इस हवा-हवाई विकास से सरकार का भ्रम कब तक टूटेगा?
अब तब महंगाई के मोर्चे पर पूरी तरह चित हो चुकी सरकार के लिए महंगाई से लोगों को राहत दिलाने का यही एक मात्र हथियार है। लेकिन सरकार के रवैये से लगता नहीं है कि वह इस बार भी ऐसा कुछ करने जा रही है क्योंकि उन्हें लोगों की बेहतर जिंदगी से ज्यादा अर्थव्यवस्था की ऊंची विकास दर प्यारी है। बजट सत्र के दौरान सरकार ने साफ तौर पर कह दिया वह महंगाई से तो चिंतित है लेकिन किसी भी शर्त पर ऊंची विकास दर से समझौता नहीं किया जा सकता। सरकार की मंशा जाहिर है कि उसे विकास दर कम करने की शर्त मंजूर नहीं है भले ही आम आदमी महंगाई की इस चक्की में पिस-पिस कर मर जाए। सरकार को आम लोगों की परेशानी से कोई लेना-देना नहीं है।
ऊंची विकास दर को बनाए रखना गलत नहीं है लेकिन कृषि क्षेत्र को बिल्कुल उपेक्षित रखना खतरनाक है। सरकार के इरादे से तो यही लगता है कि केवल विदेशी पूंजी निवेश बढ़ाने और आर्थिक सुधार की गति तेज करने से ऊंची विकास दर आसानी से हासिल की जा सकती है। जबकि सरकार का जोर कृषि क्षेत्र में सुधारों पर बिल्कुल भी नहीं है। सरकार को यह याद रखनी चाहिए कि कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन से ही हम मजबूत आर्थिक विकास की ओर बढ़ सकेंगे। कृषि उत्पादन बढऩे की स्थिति में ही सरकार को भी महंगाई पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी। देखा जाए तो हाल के दिनों में खाद्य वस्तुओं के बढ़ते दामों ने ही लोगों को सबसे ज्यादा परेशान किया है। अगर देश में कृषि उत्पादन बढ़े तो लोगों को महंगाई से भी राहत मिलेगी और देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
खेती पर आज भी देश की 67 फीसदी आबादी निर्भर करती है। जब कृषि क्षेत्र का विकास होगा तभी खेती कार्यों से जुड़े लोगों विशेषकर किसानों और मजदूरों की माली हालत सुधरेगी। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र क्षेत्र का समग्र विकास संभव होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक विकास के जरिये ही देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है और इससे ऊंची विकास दर को बनाए रखने में भी आसानी होगी। सरकार को एक बात साफ तौर पर जान लेनी चाहिए कि केवल दिल्ली, मुंबई और अन्य महनगरों में ऊंची-ऊंची इमारतें, चमचमती गाडिय़ां और बहुराष्टï्रीय कंपनियों में काम के लिए दिन रात भागते लोग ही विकास का पैमाना नहीं है। इस हवा-हवाई विकास से सरकार का भ्रम कब तक टूटेगा?
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